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Rajasthan ki prachin sabhyata

 राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार राजस्थान का इतिहास पूर्व पाषाण काल से प्रारंभ होता है। आज से करीब एक लाख वर्ष पहले मनुष्य मुख्यतः बनास नदी के किनारे या अरावली के उस पार की नदियों के किनारे निवास करता था। आदिम मनुष्य अपने पत्थर के औजारों की मदद से भोजन की तलाश में हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते रहते थे, इन औजारों के कुछ नमूने बैराठ, रैध और भानगढ़ के आसपास पाए गए हैं। प्राचीनकाल में उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में वैसा मरुस्थल नहीं था जैसा वह आज है। इस क्षेत्र से होकर सरस्वती और दृशद्वती जैसी विशाल नदियां बहा करती थीं। इन नदी घाटियों में हड़प्पा, ‘ग्रे-वैयर’ और रंगमहल जैसी संस्कृतियां फली-फूलीं। यहां की गई खुदाइयों से खासकर कालीबंग के पास, पांच हजार साल पुरानी एक विकसित नगर सभ्यता का पता चला है। हड़प्पा, ‘ग्रे-वेयर’ और रंगमहल संस्कृतियां सैकडों दक्षिण तक राजस्थान के एक बहुत बड़े इलाके में फैली हुई थीं। कालीबंगा सभ्यता जिला – हनुमानगढ़ नदी – सरस्वती(वर्तमान की घग्घर) समय – 3000 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व तक। राजस्थान की सबसे पुराणी सभ्यता काल – ताम्र युगीन ...

कक्षा 11 लेखाशास्त्र सिलेबस 2018 - 19 (Class 11 Commerce Accountancy Syllabus 2018 - 2019)

Class 11 Commerce Accountancy Syllabus 2018 - 2019

Detail of Syllabus
भाग क
1.     लेखांकन का परिचय : पुस्तपालन एवं लेखांकन का अर्थ                       07 अंक
उद्देश्य, लेखांकन कला एवं विज्ञान के रूप में, लेखांकन एवं पुस्तपालन में अंतर, लेखांकन के उपक्षेत्र, लेखांकन के कार्य, लेखांकन का अन्य शास्त्रों के साथ सम्बन्ध, लेखांकन की प्रणाली, लेखांकन की आधारभूत शब्दावली, क्रय, विक्रय, क्रय वापसी, विक्रय वापसी, पूँजी, आहरण, संपत्तियां (तरल, स्थाई, अदृश्य, काल्पनिक) देयताएं, दायित्व (बाहरी, आतंरिक, अल्पकालीन, दीर्घकालीन ), प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्यय, आयगत एवं पूंजीगत प्राप्तियां, स्थगित आयगत व्यय, दोहरा लेखा पद्धति, अर्थ, सिद्धांत, अवस्थाएं, लेखांकन की आधारभूत अवधारणाए, परम्पराएँ एवं मान्यताएं .
*भारत में प्रचलित लेखा मानकों का सम्बंधित विषय वस्तु के साथ यथा सम्भव उल्लेख किया जाएगा.
2.       प्राचीन भारतीय लेखांकन                                         04 अंक
प्राचीन भारतीय नीति ग्रंथों में लेखांकन की अवधारणा, लेखांकन की शब्दावली, लेखाकार व लेखा संगठन का स्वरुप . परलौकिक लेखांकन के अवधारणा, महाजनी बही खाता पद्धति : इतिहास.
3.       प्रारम्भिक लेखा – जर्नल एवं सहायक बहियाँ – अर्थ एवं लेखांकन          13 अंक
समीकरण पर आधारित खातों का वर्गीकरण , लेखांकन समीकरण के आधार पर नाम व जमा करने के नियम , व्यवहारों के लेखांकन में समीकरण का उपयोग . जर्नल : व्यवहार की उत्पत्ति , प्रमाणक का स्त्रोत (बीजक , कैश मेमो , पे स्लिप , चेक आदि ) प्रमाणक तैयार करना – नकद (डेबिट एवं क्रेडिट ) व गैर नकद (हस्तांतरण ), जर्नल का अर्थ , जर्नल के लाभ , खातों के प्रकार , जर्नल में लेखा करने के नियम , जर्नल का प्रारूप , जर्नल में लेखा करने की विधि व लेखा , जर्नल प्रविष्टियाँ . सहायक बहियाँ : लाभ , प्रकार , क्रय बही, विक्रय बही, विक्रय वापसी बही , क्रय वापसी बही , मुख्य जर्नल .
4.       खाता बही एवं खतौनी – 07 अंक
खाता बही का अर्थ, खाते का प्रारूप , जर्नल से खाताबही में खतौनी, सहायक बहिओ, (क्रय, विक्रय, क्रय वापसी, विक्रय वापसी व मुख्य जर्नल ) से खाताबही में खतौनी, खातों का शेष निकालना .
5.       तलपट एवं अशुद्धियों का सुधार – 06 अंक
तलपट का अर्थ , विशेषताएं उद्देश्य, तलपट बनाने की विधियाँ, योग विधि , शेष विधि . अशुद्धियाँ एवं उनका सुधार, अशुद्धियों का पता लगाना , उचंती खाता तैयार करना , अशुद्दियों के प्रकार , तलपट को प्रभावित नहीं करने वाली अशुद्धियाँ , तलपट को प्रभावित नहीं करने वाली अशुद्धियाँ , अशुद्धियों का सुधार – तलपट बनाने से पूर्व , तलपट बनाने के पश्चात् पर अंतिम खाते बनाने से पूर्व .
6.       अंतिम खाते : अंतिम खाते का आशय एवं महत्त्व , निर्माणी खाता :अर्थ , आवश्यकता , उद्देश्य , निर्माण विधि , पूंजीगत एवं आयगत व्यय . व्यापार खाता : अर्थ , आवश्यकता , उद्देश्य , व्यापार खाते में दिखाई जाने वाली मदें , अंतिम प्रविष्टियाँ एवं हस्तांतरण प्रविष्टियाँ, लाभ – हानि खाता : अर्थ , आवश्यकता , उद्देश्य , लाभ – हानि खाते में दिखाई जाने वाली मदें , अंतिम प्रविष्टियाँ . स्थिति विवरण : अर्थ , आवश्यकता , उद्देश्य , विशेषताएं , स्थिति विवरण में दिखाई जाने वाली मदें , स्थिति विवरण में संपत्ति दायित्वों को दिखाने का निश्चित क्रम . अंतिम खाते बनाना : तलपट एवं स्थिति विवरण में अंतर .
7.       अंतिम खाते समायोजन सहित : समायोजन प्रविष्टियों का अर्थ , आवश्यकता एवं प्रविष्टियों का प्रभाव , समायोजन प्रविष्टियाँ – अंतिम स्टॉक , अदत्त व्यय , पूर्वदत्त व्यय , उपार्जित आय , अनुपार्जित आय , पूँजी पर ब्याज , आहरण पर ब्याज , मूल्य ह्रास , संदिग्ध ऋणों के लिए आयोजन , देनदारों पर बट्टा एवं आयोजन , लेनदारों पर बट्टा एवं संचय ,संपत्ति का निजी उपयोग , प्रबंधक का पारिश्रमिक, पसंदगी पर माल भेजना , आकस्मिक हानियाँ , परस्पर ऋण , कर की कटौती .

भाग ख
8.       रोकड़ बही – 08 अंक
बैंक सम्बन्धी व्यवहार : परिचय, बैंक खातों के प्रकार बैंक व्यवहार सम्बन्धी जर्नल प्रविष्टियाँ, रोकड़ बही : अर्थ, आवश्यकता , लाभ , रोकड़ बही के प्रकार, साधारण रोकड़ बही तैयार करना , साधारण रोकड़ बही से खाता बही में खतौनी करना , द्विस्तम्भिय रोकड़ बही तैयार करना , स्वीकृत नकद बट्टा , प्राप्त नकद बट्टा , द्वि स्त्म्भीय रोकड़ बही से खाता बही में खतौनी करना , त्रिस्तम्भीय रोकड़ बही तैयार करना , चेक प्राप्ति एवं बैंक में जमा पर व्यवहार , विपरीत प्रविष्टी , त्रिस्तम्भीय रोकड़ बही के शेष निकालना, बहुस्तम्भीय रोकड़ बही , लघु रोकड़ बही तैयार करना, अग्रदाय पद्धति , अग्रदाय पद्दति के लाभ , लघु रोकड़ बही ले खाता बही में खतौनी करना
9.       बैंक समाधान विवरण  06 अंक
प्रस्तावना , अर्थ , परिभाषा , आवश्यकता एवं महत्त्व , रोकड़ बही एवं पास बुक के शेष में अंतर (तीन चरणों में – समय में अंतर , स्थाई आदेश के तहत भुगतान , अशुद्धियाँ ) बैंक समाधान विवरण तैयार करना , रोकड़ शेष को आधार मानकर, बैंक पास बुक के शेष को आधार मानकर , समायोजित रोकड़ बही के आधार पर बैंक समाधान विवरण तैयार करना 
10.   विनिमय बिल 04 अंक
11.   परिचय , अर्थ एवं परिभाषा , विशेषताएं , पक्षकार , प्रारूप , विनिमय विपत्र के लाभ , विनिमय विपत्र के भेद , बिल से सम्बंधित प्रमुख शब्दावली , बिल अवधि , देय तिथि , अनुग्रह दिवस , समयपूर्व भुगतान , बिल का पराक्रमण, (सुपुर्दगी पर बेचान द्वारा ), बिल भुनाना , बिल को संग्रहण हेतु बैंक में भेजना , बिल अनादरण , निकराइ व्यय , बिल का नवीनीकरण , स्वीकारकर्ता का दिवालिया होना , प्रतिज्ञा पत्र : अर्थ , प्रारूप, विनिमय बिल एवं प्रतिज्ञा पत्र में अंतर , हुंडी :अर्थ , प्रकार , प्राप्य बिल बही एवं देय बिल बही का प्रारूप , विनिमय बिल एवं प्रतिज्ञा पत्र का लेखांकन
12.   मूल्य ह्रास आयोजन एवं  संचय 08 अंक
मूल्य ह्रास : अर्थ , परिभाषा , आवश्यकता , मूल्य ह्रास के कारण , मूल्य ह्रास और अप्रचलन , संपत्तियों की दृष्टी से वर्गीकरण , मूल्य ह्रास विधियाँ – स्थायी क़िस्त विधि , क्रमागत ह्रास विधि , मूल्य ह्रास विधि में परिवर्तन , - चालु वर्ष से व पिछले वर्षों से , वार्षिक वृत्ति विधि
13.   वर्गीय एवं स्वकीय संतुलन प्रणाली 08 अंक
वर्गीय संतुलन प्रणाली , अर्थ , देनदार , खाता बही , लेनदार खाता बही व सामान्य खाता बही , स्वकीय संतुलन प्रणाली : अर्थ , समायोजन या नियंत्रण खाते , देनदारों की खाता बही , लेनदारों के खाता बही व सामान्य खाता बही , खाता बही में विपरीत शेष , अन्तः खाता हस्तांतरण , विपरीत खाते एवं समायोजन , वर्गीय एवं स्वकीय संतुलन प्रणाली में अंतर , वर्गीय एवं स्वकीय स्वकीय संतुलन प्रणाली से लाभ
14.   अपूर्ण अभिलेखों के खाते 08 अंक
प्रस्तावना , अपुर्ण लेखों का अर्थ , परिभाषा एवं विशेषताएं, अपूर्णता के कारण , दोहरा लेखा विधि एवं अपूर्ण लेखा विधि में अंतर , अपूर्ण लेखा विधि के दोष , अपूर्ण लेखों से लाभ – हानि ज्ञात करना , अवस्था विवरण विधि अथवा स्थिति विवरण विधि , परिवर्तन विधि (विस्तृत परिवर्तन विधि एवं संक्षिप्त परिवर्तन विधि )
15.   लेखांकन में कंप्यूटर 08 अंक
कंप्यूटर परिचय , लेखांकन सूचना प्रणाली: अर्थ , परिभाषा , उद्भव क्षेत्र, मानवकृत एवं कम्पुटरिकृत लेखांकन में तुलना , लेखांकन सॉफ्टवेर के संरचना एवं प्रकार , सिस्टम प्रपत्रिकरण: अर्थ , आवश्यकता , प्रवाह चित्र निर्णयन तालिका , समंक प्रवाह चित्र

निर्धारित पुस्तक लेखाशास्त्र – माध्यमिक शिक्षा बोर्ड , राजस्थान , अजमेर

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